अपना, अपनापन! कहने को तो बस शब्द हैं मगर जिंदगी में सांसों
की तरह काम करते हैं। ऐसा भी नहीं जो लोग अकेले हैं वो जिंदगी नहीं जीते, मगर
अपनों के होने का एहसास जिंदगी को आसान बना देता है। यदि अकेलेपन को परिभाषित करूं
तो यह रात के अंधेरे-सा होता है, जिसमें कोई एक दीपक जला दे तो सारा ध्यान उस ओर
चला जाता है। ऐसे ही एक दीपक को आज की अंधेरी दुनिया में मैंने जलते हुए देखा है।
जिसका नाम है अपना घर । राजस्थान के भरतपुर से आठ किलोमीटर की दूरी पर अछनेरा
मार्ग पर स्थित गांव बझेरा में बना अपना घर असल मायनों में एक मंदिर है। जिन लोगों
को अपनों ने पराया करके रास्ते पर छोड़ दिया उन लोगों को अपनाघर बिना किसी रिश्ते
के अपनाता है।
अपना घर में भगवान का मंदिर भी है और
भगवान की मूर्त भी हैं लेकिन इस मंदिर को एक इंसानी फरिश्ता चला रहा है, जिनका
नाम है डॉ बीएम भरद्वाज। अलीगढ़ के छोटे से गांव शहरोई में बाबूलाल भारद्वाज एवं
रामवती देवी के यहां एक मार्च 1967 को जन्में डॉ बीएम भरद्वाज ने अपना घर की स्थापना
29 जून 2000 में की थी। इस आंगन को डॉ भरद्वाज ने अपनी पत्नी डॉ माधुरी भारद्वाज
के साथ मिलकर देखा और साकार किया है।
कहते हैं कोई भी चीज दुनिया में बिना किसी वजह के नहीं होती है। इसी तरह डॉ
भरद्वाज ने भी अपने सपने को जन्म के साथ नहीं देख था। न्यूटन को सेब का गिरना
दिखा और गुरुत्वाकर्षण का पता चला। उसी तरह दर्द तो दुनिया में बहुत है लेकिन उसे
महसूस करने वाले कम है। डॉ भरद्वाज को भी बचपन में घर में काम करने वाले नौकर के
शरीर में बीमारी के कारण पड़े जख्मों की पीड़ा ने जीवन जीने का उद्देश्य दे
दिया। मुसीबत में अपने नौकर की हालत देख डॉ भरद्वाज के दिल- ओ दिमाग में इस कद्र
चोट हुई कि आज हर पराए की मुसीबत को फर्ज मानकर वो अपनाते जा रहें है। यहां तक कि
डॉ भरद्वाज दंपति ने अपनी संतान नहीं पैदा करने का संकल्प कर सारा जीवन असहायों
को सहारा देने का प्रण का लिया है।
मुझे भी डॉ भरद्वाज और अपनाघर के आंगन में सुरक्षित, पीड़ारहित जीवन जीने
वालों से मिलने का मौका हाल ही में मिला। यहां हर वो इंसान है जिसका कोई अपना नहीं
था और जिनहें अपनों ने पराया कर दिया था। एक बड़े से हॉल में चारों तरफ साफ-सुथरे
बेड पड़े थे। यहां के लागों को देख लगा हर इंसान की यहां अपनी कहानी है, जिसे
सुनकर बोलने के लिए शब्द नहीं बचते हैं। मेरी भी आंखे भीग गईं जब एक लड़की ने
मुझे अचानक से गले लगाकर कहा- मुझे यहां
से कब ले चलोगी ? मेरे घर का पता मुझे याद है,
मेरी शादी होने वाली है ! पहली बार में रोंगटे खड़े कर देने वाला एहसास
था, तब अपना घर के सहयोगियों ने बताया कि कई महीनों पहले यह महिला बिना कपड़ों के
राह पर मिली थी, जो पूरी तरह से अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है। फिर भी उसे याद है
अपनों का नाम और अपने घर का पता, जिनके लिए वो लापता हो चुकी है। ऐसी एक नहीं
सैकड़ों कहानियां है यहां मगर सुनने और देखने उनके नाम के अपने कभी नहीं आते हैं ।
इतने दर्द सुनकर- देखने के बाद मालूम पड़ता हे जिंदगी हकीकत में कोई और होती
है। डॉ भरद्वाज अपनी जीवनसंगिनी डॉ माधुरी के साथ मिलकर एक ऐसा घरौंदा बनाया है
जहां इंसानियत बसती है। हर व्यक्ति के लिए कपड़े खाने, रहने के लिए पूरा इंतजाम किया
गया है। बुआ-बहनों, दादी-नानी के नाम से महिलाओं के रहने के लिए कमरे बने हैं।
पुरुषों के रहने के लिए चाचा- भईया का घर बना हुआ है। डॉ भरद्वाज बताते हैं यहां
रहने वाले ज्यादातर लोगों इस परिस्थित में हैं जो कपड़ों में ही मल-मूत्र कर देते
हैं। कई तो उपचार के बाद ठीक भी हो गए हैं और उनके अपनों को खबर भी कर दी गई है।
बस उन्हें लेने कोई नहीं आता है।
जब इरादे नेक हों तो ईश्वर भी साथ देता है, डॉ भरद्वाज दंपति के नेक इरादों
का नतीजा है कि आज तक इन्हें कहीं चंदा मांगने नहीं जाना पड़ा है। दो लोगों से
मिलकर शुरू किए गए काम में आज हजारों लोग जुट चुके हैं। आज अपनाघर 30 हजार से अधिक
लोगों के सहयोग से चल रहा है। भरतपुर के अलावा कोटा, अजमेर और दिल्ली में भी अपनाघर
का घरौंदा हर किस्मत के मारे के लिए बना है। इन अपनों को अपनाने के साथ अंतिम
विदाई की अग्नि का भी इंतजाम खुद यहां के लोग करते है। यहां आकर लगता है कि कभी
जिंदगी में स्वर्ग देखना हो तो भरतपुर के अपनाघर के आश्रम रहने वाले लोगों से
जरुर मिलिए जो जिन्हें इंतजार है अपनों का मगर जरूरत नहीं क्योंकि उन्हें यहां
किसी ईश्वर के फरिश्ते ने अपना बना लिया है।
किसी को कोई व्यक्ति असहाय, लावारिस व बीमार पड़ा दिखे और व जीवन और मौत से
संघर्ष कर रहा हो, तो उन्हें अपनाघर का पता बता दिया जाए ताकि उसके जीवन को बचाने
में आप भी मददगार बन सकें। अपनाघर के लिए कोई सहयोग करना चाहे तो अपनाघर के द्वार
खुले हैं।





