Sunday, October 21, 2012

“अपना घर” का आंगन


अपना, अपनापन!  कहने को तो बस शब्‍द हैं मगर जिंदगी में सांसों की तरह काम करते हैं। ऐसा भी नहीं जो लोग अकेले हैं वो जिंदगी नहीं जीते, मगर अपनों के होने का एहसास जिंदगी को आसान बना देता है। यदि अकेलेपन को परिभाषित करूं तो यह रात के अंधेरे-सा होता है, जिसमें कोई एक दीपक जला दे तो सारा ध्‍यान उस ओर चला जाता है। ऐसे ही एक दीपक को आज की अंधेरी दुनिया में मैंने जलते हुए देखा है। जिसका नाम है अपना घर । राजस्‍थान के भरतपुर से आठ किलोमीटर की दूरी पर अछनेरा मार्ग पर स्थित गांव बझेरा में बना अपना घर असल मायनों में एक मंदिर है। जिन लोगों को अपनों ने पराया करके रास्‍ते पर छोड़ दिया उन लोगों को अपनाघर बिना किसी रिश्‍ते के अपनाता है।
अपना घर में  भगवान का मंदिर भी है और भगवान की मूर्त भी हैं लेकिन इस मंदिर को एक इंसानी फरिश्‍ता चला रहा है, जिनका नाम है डॉ बीएम भरद्वाज। अलीगढ़ के छोटे से गांव शहरोई में बाबूलाल भारद्वाज एवं रामवती देवी के यहां एक मार्च 1967 को जन्‍में डॉ बीएम भरद्वाज ने अपना घर की स्‍थापना 29 जून 2000 में की थी। इस आंगन को डॉ भरद्वाज ने अपनी पत्‍नी डॉ माधुरी भारद्वाज के साथ मिलकर देखा और साकार किया है।
कहते हैं कोई भी चीज दुनिया में बिना किसी वजह के नहीं होती है। इसी तरह डॉ भरद्वाज ने भी अपने सपने को जन्‍म के साथ नहीं देख था। न्‍यूटन को सेब का गिरना दिखा और गुरुत्‍वाकर्षण का पता चला। उसी तरह दर्द तो दुनिया में बहुत है लेकिन उसे महसूस करने वाले कम है। डॉ भरद्वाज को भी बचपन में घर में काम करने वाले नौकर के शरीर में बीमारी के कारण पड़े जख्‍मों की पीड़ा ने जीवन जीने का उद्देश्‍य दे दिया। मुसीबत में अपने नौकर की हालत देख डॉ भरद्वाज के दिल- ओ दिमाग में इस कद्र चोट हुई कि आज हर पराए की मुसीबत को फर्ज मानकर वो अपनाते जा रहें है। यहां तक कि डॉ भरद्वाज दंपति ने अपनी संतान नहीं पैदा करने का संकल्‍प कर सारा जीवन असहायों को सहारा देने का प्रण का लिया है।
मुझे भी डॉ भरद्वाज और अपनाघर के आंगन में सुरक्षित, पीड़ारहित जीवन जीने वालों से मिलने का मौका हाल ही में मिला। यहां हर वो इंसान है जिसका कोई अपना नहीं था और जिनहें अपनों ने पराया कर दिया था। एक बड़े से हॉल में चारों तरफ साफ-सुथरे बेड पड़े थे। यहां के लागों को देख लगा हर इंसान की यहां अपनी कहानी है, जिसे सुनकर बोलने के लिए शब्‍द नहीं बचते हैं। मेरी भी आंखे भीग गईं जब एक लड़की ने मुझे अचानक से गले लगाकर कहा-  मुझे यहां से कब ले चलोगी ? मेरे घर का पता मुझे याद है, मेरी शादी होने वाली है !  पहली बार में रोंगटे खड़े कर देने वाला एहसास था, तब अपना घर के सहयोगियों ने बताया कि कई महीनों पहले यह महिला बिना कपड़ों के राह पर मिली थी, जो पूरी तरह से अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है। फिर भी उसे याद है अपनों का नाम और अपने घर का पता, जिनके लिए वो लापता हो चुकी है। ऐसी एक नहीं सैकड़ों कहानियां है यहां मगर सुनने और देखने उनके नाम के अपने कभी नहीं आते हैं ।
इतने दर्द सुनकर- देखने के बाद मालूम पड़ता हे जिंदगी हकीकत में कोई और होती है। डॉ भरद्वाज अपनी जीवनसंगिनी डॉ माधुरी के साथ मिलकर एक ऐसा घरौंदा बनाया है जहां इंसानियत बसती है। हर व्‍यक्ति के लिए कपड़े खाने, रहने के लिए पूरा इंतजाम किया गया है। बुआ-बहनों, दादी-नानी के नाम से महिलाओं के रहने के लिए कमरे बने हैं। पुरुषों के रहने के लिए चाचा- भईया का घर बना हुआ है। डॉ भरद्वाज बताते हैं यहां रहने वाले ज्‍यादातर लोगों इस परिस्थित में हैं जो कपड़ों में ही मल-मूत्र कर देते हैं। कई तो उपचार के बाद ठी‍क भी हो गए हैं और उनके अपनों को खबर भी कर दी गई है। बस उन्‍हें लेने कोई नहीं आता है।
जब इरादे नेक हों तो ईश्‍वर भी साथ देता है, डॉ भरद्वाज दंपति के नेक इरादों का नतीजा है कि आज तक इन्‍हें कहीं चंदा मांगने नहीं जाना पड़ा है। दो लोगों से मिलकर शुरू किए गए काम में आज हजारों लोग जुट चुके हैं। आज अपनाघर 30 हजार से अधिक लोगों के सहयोग से चल रहा है। भरतपुर के अलावा कोटा, अजमेर और दिल्‍ली में भी अपनाघर का घरौंदा हर किस्‍मत के मारे के लिए बना है। इन अपनों को अपनाने के साथ अंतिम विदाई की अग्नि का भी इंतजाम खुद यहां के लोग करते है। यहां आकर लगता है कि कभी जिंदगी में स्‍वर्ग देखना हो तो भरतपुर के अपनाघर के आश्रम रहने वाले लोगों से जरुर मिलिए जो जिन्‍हें इंतजार है अपनों का मगर जरूरत नहीं क्‍योंकि उन्‍हें यहां किसी ईश्‍वर के फरिश्‍ते ने अपना बना लिया है।
किसी को कोई व्‍यक्ति असहाय, लावारिस व बीमार पड़ा दिखे और व जीवन और मौत से संघर्ष कर रहा हो, तो उन्‍हें अपनाघर का पता बता दिया जाए ताकि उसके जीवन को बचाने में आप भी मददगार बन सकें। अपनाघर के लिए कोई सहयोग करना चाहे तो अपनाघर के द्वार खुले हैं।                                        


Saturday, October 20, 2012

तेरे लिए.....


माना मैं मचल गई थी
माना मैं बहक गई थी,
तेरे साथ जमीं को छोड़
मैं फलक पर पहुंच गई थी।
एक अलहड़ से बच्‍चे की तरह बिना सोचे- समझे
मैनें सपने बुने और तुझसे ख्‍वाहिश बयां की,
मगर न जाने कब मेरे सपने सजा, 
ख्‍वाहिशें खता बन गई,
आज एक बार फिर तेरे लिए मैं बुत बन गई। 

Tuesday, October 9, 2012

प्‍यार…!


मुझे मालूम था अपना दर्द कल भी और आज भी,
मगर तुम साथ रहोगे
यह सोचा जी लूंगी तकलीफ की चादर में सिमट कर भी।
मगर तुम साथ होकर भी आज साथ छोड़कर चल रहे हो,
क्‍या सोचते हो चली जाऊंगी तुम्‍हें छोड़कर कहीं !
माना बहुत मुश्किल है किसी का हक तुम पर देखना
मगर नामुमकिन है तुम्‍हारे बिना जिंदगी जीना
यही सोचकर किया था फैसला मैंने कल,
और कायम हूं उसी फैसले पर आज भी !
शायद जिंदगी कर रही है मेरी आजमाइश
मगर जब भी जिंदगी जियेगी मेरी जिंदगी का एक कतरा,
खामोश टीस उठेगी अपने प्‍यार पर देख किसी और का हक भी !  

Sunday, October 7, 2012

क्‍या कभी तुमने महसूस किया है…


क्‍या कभी तुमने महसूस किया है
जब मेरे सामने होकर भी मैं मुम्‍हें आवाज नहीं दे सकती,
जब तुम्‍हारे उठ के जाने पर मैं रोक नहीं सकती।
क्‍या कभी तुमने महसूस किया है
मेरे अंदर इंतजार कर रहे उन तमाम ख्‍वाबों को
जो आज भी तुम्‍हारे नाम पर बुने हैं।
क्‍या कभी तुमने महसूस किया है
मेरे सिले होंठ और चीखती आंखों को
जो तुम पर बस अपना हक चाहती है।
क्‍या कभी तुमने महसूस किया है
शाम को लौटकर मेरा खामोश चौखट को देखना
और हर रात बस तुम्‍हारी यादों के साथ सोना।
आज फिर तमाम सवाल बिखरे पड़े हैं मेरे सिरहाने,
जिनका जवाब मुझे बखूबी मालूम है...
हर रोज किया है महसूस तुमने मेरा हर दर्द,
फिर भी खुद से नहीं एक बार कहा है!


Wednesday, September 19, 2012

छूने दो मुट्ठी भर आसमान



करियर और शादी, दोनों ही लड़की की जिंदगी में खास होते हैं। फिलॉसफी में कहें तो शादी जमीं तो करियर आसमान होता है। बस अपने आसमां तक पहुंचने की इजाजत हर लड़की को नहीं होती है। लेकिन अब वक्‍त करवट बदल रहा है, लड़कियां शादी से पीछे नहीं हट रहीं लेकिन करियर को पहले रख रहीं हैं। शायद इसलिए कि पति तो मिल ही जाएगा मगर करियर का वक्‍त शादी के बाद नहीं। इस सोच के पीछे की असली वजह कभी सोची है ?  अचानक पति परमेश्‍वर को दूसरा दर्जा कब मिल गया। लड़की की जिंदगी के लीड हीरो को सपोर्टिंग रोल कैसे मिल गया। जिस लड़की को बचपन से परिवार और संस्‍कार सिखाए जाते हैं वह अचानक अपने लिए नए नियम बनाना क्‍यों चाहती है?
वजह कई हैं मगर जो अहम है वो है मेंटली आजाद होने की आजादी। कह सकते हैं वजह दो हैं इमोशनल और प्रेक्टिल। इमोशनल पहलू है कि एक छोटे से शहर से जो लड़की आगे बढने के लिए इतने जोश में है कि किसी की सुनना नहीं चाहती, बस अपना मुकाम पाना चा‍हती है। शादी को उसने किनारे कर दिया है क्‍योंकि उसने अपने आस-पास ऐसी औरतों को देखा है जो खुश है मगर कहने को। किचन में क्‍या आएगा वो डिसाइड कर सकती हैं मगर बच्‍चे का करियर नहीं। क्‍योंकि मामला गंभीर है और इसका फैसला पति मतलब पिता लेगा।
उसने अपनी मां के अंदर दिल के किसी कोने में भी एक मुरझाया- सा सपना आज भी पड़ा देखा है। जिसने शादी के साथ दम तोड़ दिया था। कब सपने बच्‍चों और पति में बदल गए खुद उसे ही पता नहीं चला है। आज वो अपने सपनों को बच्‍चों में जी रही है। हर लड़की ने इस वक्‍त को अपने घर में या फिर किसी करीबी के साथ्‍ देखा है। यह बहुत खास वजह भी है जो उसने आज शादी से तौबा करके पहले सपने पूरे करने का वादा खुद से किया है। करियर में उसे आज सिर्फ औहदा ही नहीं चाहिए बल्कि एक फइनेंशली फिट लाइफ चाहिए। जिससे वह कल अपने बच्‍चों के लिए फैसले ले सके सिर्फ उसकी राय औपचारिकता के लिए नहीं मांगी जाए। साथ ही जब बच्‍चे मां के बारे में सोचे तो मां पर दया और सहानूभूति नहीं गर्व हो।
दूसरी प्रैक्टिकल वजह है लड़कियों का लड़कों से आगे खुद को साबित करना। जिसके लिए मां-पापा और समाज जिम्‍मेदार है। जिनका एक सूत्री कार्यक्रम है लड़की को लड़की होने का एहसास कराना। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, जाओं तो शाम होने से पहले घर आओ। कॉलेज भाई छोड़ आएगा। फिर चाहे भाई  कालेज की लड़कियों को छेड़ता पाया जाए। सबसे बड़ी मुसीबत लड़का किसी अनजान से बात करे तो कम्‍यूनिकेशन बना रहा है और लड़की बात करते मिले तो पड़ोसी घर पहुंचकर कहेंगे शादी कर दो लड़‍की बड़ी हो गई है। इतनी मुसीबत कि दिमाग का दही हो जाए और लगे ऐ खुदा तूने लड़की क्‍यों बनाया ।
मगर इन सब से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है, जिसे आज अपनाया गया है। खुद की पहचान बनाओ क्‍योंकि रास्‍ता बताने कोई नहीं आता रास्‍ते खुद बनाने होते हैं। इसी को गांठ बांध आज की लड़की चल पड़ी है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। हां अब बात आती है सही वक्‍त पर शादी की, तो क्‍या बुरा है शादी उस वक्‍त करना जब उसे खुद पता हो कि उसकी शादी है। अपनी मां, ताई , बुआ, चाची की तरह वो नहीं चाहती कि बच्‍चों से कहे जब शादी हुई तो हमें पता ही नहीं था। उसे सिर्फ रिश्‍ते को निभाना नहीं किसी के साथ जीना है। बड़ी अजीब कशमकश होती है जिंदगी की शादी। आज एक लड़की उसे समझकर अपनाना चा‍हती है । अगर समाज का एक वर्ग गलत मानता है तो उसे यह सोचना होगा जब परिपक्‍व बनना है तो ग‍लतियां भी होंगी और सही रास्‍ता भी मिलेगा। एक बार उस लड़की की नजर से भी देखा जाए जो समाज का ही हिस्‍सा है। जो लोग आज भी नहीं समझे उन्‍हें समझना होगा। शादी करने से पहले उसे करियर का पायदान पार करना है, करवाचौथ रखने से पहले करियर बनाना है।           

Monday, September 17, 2012

गीतिका का शॉर्टकट


शोहरत और पैसों से जुड़ी खूबसूरती की कहानी एक बार फिर अखबारों से लेकर टीवी चैनलों की सुर्खियां बनी है। कल यह स्‍टोरी हिट होकर किसी फिल्‍म की कहानी भी बन जाएगी। इस बार कहानी शुरुआत हुई है गीतिका के अंत से। एयरहोस्‍टेस का प्रोफेशन चुनने के साथ गीतिका ने बहुत तरक्‍की हासिल की। बेहद कम समय में ऐश-ओ-आराम की जिंदगी का स्‍वाद चखा। लेकिन अंतत: मौत को गले लगा लिया। मरने से पहले गीतिका ने एक सुसाइड नोट छोड़ा है। इस नोट में गोपाल कांडा को गीतिका ने अपनी मौत का जिम्‍मेदार ठहराया है। गीतिका एक महिला है, सुसाइड नोट पढ़ने के बाद सहानुभूति मिलना लाजमी ही है। लेकिन एक सवाल यह है कि क्‍या गीतिका खुद जिम्‍मेदार नहीं है ? गीतिका का एक आम लड़की की तरह सेंसटिव नेचर की थी। कांडा से धोखा मिलना उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। यह सब सच है, मगर यह सिर्फ एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है कि आम इंसान की तरह गीतिका ने भी सपने देखे। उन्‍हें पूरा करने के लिए एक शार्टकट चुना, जिसका नाम था कांडा। मगर हम इस बात को क्‍यों भूल जाते हैं कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता। अगर शार्टकट से सफलता मिल भी जाए तो वह ज्‍यादा दिन साथ नहीं रहती है। गीतिका के साथ भी शायद यही हुआ है। फिर आज उसके हश्र के लिए सिर्फ कांडा गुनहगार ? भावनाएं इतनी कमजोर क्‍यों है कि कांडा जैसा कोई भी इंसान उसका फायदा उठाए।
सिर्फ गीतिका के साथ ही क्‍यों इसी लिस्‍ट में हाल ही में एक नाम है फिजा का। जिसने प्‍यार किया, शादी करने के लिए धर्म बदला, दूसरी पत्‍नी होने का दर्जा हासिल किया, फिर तलाक और अंतत: गुमनामी और अब दर्दनाक मौत! जिस हाल में फिजा की लाश मिली, वह साफ बयां करती है फिजा की बेबसी। फिजा ने भी अपनी मौत का डर जताया था। लेकिन मरने से बचाने कोई नहीं आया। आज ऐसे किस्‍से एक नहीं हजार है और इनकी संख्‍या बढ़ती ही जा रही है। ऐसा नहीं की सपने देखना गलत है, प्‍यार में वफादार होना कोई गुनाह है। लेकिन जब समाज को परे रख कोई फैसला करो तो उसे जीने की हिम्‍मत भी करो। जब शोहरत पाना का सपना देख लिया है तो उसका जरिया किसी और को बनाने से अच्‍छा है अपनी काबलियत को बनाओ। गीतिका ने एक साल के अंदर अपनी सैलरी से कई गुना ज्‍यादा का इंक्रिमेंट हासिल किया। बिना कंपनी के शेयर होने के बाद भी कंपनी के ट्रस्‍टी होने का पद मिल गया। जब शोहरत इतनी जल्‍द मिली तो उसका साइड इफेक्ट भी तो होना था, उसे गलत कैसे कहा जा सकता है। जब सफलता की नींव ही खुद अपनी न हो तो असफलता का डर क्‍यों! कांडा ने गीतिका को टार्चर किया क्‍योंकि उसने वो मौके खुद दिए हैं। कंपनी के अपाइंटमेंट लेटर में हर शाम रोज मिलकर जाने की शर्त को मानकर नौकरी करना गलत नहीं है ? हां जब तक पैसों की चाहत रही सब ठीक लगा। जब हकीकत का अंदाजा हुआ तब सब संभालना नामुमकिन हो गया।
गीतिका ने जो बातें सुसाइड नोट पर लिखी हैं वहीं पुलिस को पहले क्‍यों नहीं कहा गया। माना कांडा से डर था जिस वजह से वो बोल नहीं स‍की। जब मरने का ही रास्‍ता चुना था फिर डर कैसा था मार्डन सोसाइटी की एक लड़की ने कांडा का कांड क्‍यों नहीं कर डाला। बहुत- सी गीतिका आज भी है दुनिया में हैं, जिनमें कितनों की मौत की खबर तक नहीं मिलती। न जाने कितने ऐसे भी हैं जो जीते जी मर चुके हैं। आज जिस समाज में हम हैं वहां हमें हौसलों से बहुत बुलंद होना है। सपनों को देखने के साथ पूरा करने की हिम्‍मत भी बेशुमार चाहिए। असली जंग हमेशा दूसरों से नहीं अपनों से शुरू होती है। गीतिका अपने आप से हार गई। अपने फैसलों का शिकार हुई, जो वक्‍त के साथ गलत साबित हुए। आज एक ऐसी गीतिका चाहिए जो कांडा जैसे लोगों को खुद के साथ खेलने न दे। मौत भी चुने तो अपने साथ गुनहगारों को मारकर, खुद मरकर नहीं!



Saturday, September 15, 2012

जिंदगी की आखिरी सांस ले रहा हूं
अपनी खता जानने का इंतजार कर रहा हूं,
आसमा से गुजारिश सुबह शाम करता हूं
अपने चंद आखिरी चाहता हूं।

जिंदगी की राह में अकेला चला मैं
फूल बनकर भी आज गुमशुदा हूं मैं,
ख्‍वाहिश है कभी जरिया बनूं मैं
अपनी जिंदगी किसी के नाम करूं मैं।
 
आसमा की पनाह में , जमीं के दस्‍तरखान में
आफताब की चमक में, चांद की फलक में
चंद खूबसूरत ख्‍वाहिश है मेरी
याद कर जिन्‍हें जीता हूं आज भी।

मैं मंदिर मस्जिद में सजदा करूंगा
किताबों के पन्‍नों में सोता रहूंगा
शायरों की नज्‍म में इरशाद करूंगा
किसी आशिक की मैं आशिकी बनूंगा
कभी किसी की कब्र में बिछूंगा
कभी शाने पर रखी जुल्‍फ में सजूंगा।

आज शाख पर मुरझा गया हूं
मैं जिंदगी की शब में खड़ा हूं
इस काबिल नहीं मुझे कोई बंया कर सके
मेरी गुमनाम तन्‍हाई को मुझसे जुदा कर सके।

मुरझाते हुए भी आखिरी खवाहिश है मेरी
कभी फूलों की तन्‍हाई को  न दे सदा कोई,
 बस मुस्‍कुराए दुनिया उसे देखकर
छिपी रहे दर्द की दांस्‍ता  कहीं ............


Sunday, March 25, 2012

जिंदगी और पिज्‍जा


कभी सोचा है एक इंसान की जिंदगी और पिज्‍जा में एक जैसा क्‍या है। सवाल अजीब है मगर मुझे दोनों ही एक जैसे लगते है। क्‍योंकि पिज्‍जे के टुकड़ों की तरह हमारी जिंदगी भी टुकड़ों में बटी होती है। जिसमें एक हिस्‍सा मां-पापा के नाम, दूसरा पति के नाम, तीसरा समाज के नाम, चौथा भाई-बहन के नाम, पांचवा आफिस में कुर्बान। इतने टुकड़ों में बंटे होने के बाद भी जिंदगी से कोई खुश नही। कभी सोचा है इन सबके बीच इस पिज्‍जा में हमारे नाम का सॉस भी नहीं होता । लेकिन कहने को जिंदगी हमारी है जिसमें नाम जरुर हमारा है मगर हक नही है। ऐसे ही एक परेशान इंसान से मैं सुबह उठते ही मिली, मिलकर लगा चलो हम-सा कोई तो है यहां। जिसे गम बताकर हम भी रो लेंगे, रात भर किसी के कंधो पर अपने गम का बोझा रखकर सो लेंगे। तभी आंखे ढ़ग से खोली तो देखा यहां भी धोखा हो गया है। ये कोई हम जैसा नही आईने में हमारा ही चेहरा है। फिलहाल कोई चारा नही था, सबको अपना समझकर जिंदगी के एक खूबसूरत दिन का स्‍वागत करना था। जिसकी शुरुआत आफिस के नाम थी और शाम तक इस पिज्‍जे को खाने वालों की लं‍बी कतार थी। 

Saturday, March 3, 2012

jindagi

एक औरत की जिंदगी बडी मामूली सी होती है। हजारों रंग होते है फिर भी बेरंग होती है।किसी की ख्‍वाहिश और किसी की उम्‍मीद बनकर वो हमेशा जीती है। माना ये सबको मालूम है। लेकिन ये चीजें बदलती क्‍यूं नही है। क्‍यूं जरूरी होता है कोई सहारा कोई प्‍यार बनकर उसके साथ चले। आखिर क्‍यूं किसी को अकेला छोडने में उसे तकलीफ होती है। आज मेरे जहन में ये सवाल उठे है, या हकीकत कहूं तो एहसास हो रहा है। ये भी एक रंग है अच्‍छा हो या बुरा ईश्‍वर का दिया तोहफा है। जिसमें मुझे कोई शिकायत नही कोई मलाल नही है।
                                                                 
                       अब जिंदगी बस इंतजार लगती है जिसके पूरे होने की उम्‍मीद करने की ख्‍वाहिश नही ............