Saturday, September 15, 2012

जिंदगी की आखिरी सांस ले रहा हूं
अपनी खता जानने का इंतजार कर रहा हूं,
आसमा से गुजारिश सुबह शाम करता हूं
अपने चंद आखिरी चाहता हूं।

जिंदगी की राह में अकेला चला मैं
फूल बनकर भी आज गुमशुदा हूं मैं,
ख्‍वाहिश है कभी जरिया बनूं मैं
अपनी जिंदगी किसी के नाम करूं मैं।
 
आसमा की पनाह में , जमीं के दस्‍तरखान में
आफताब की चमक में, चांद की फलक में
चंद खूबसूरत ख्‍वाहिश है मेरी
याद कर जिन्‍हें जीता हूं आज भी।

मैं मंदिर मस्जिद में सजदा करूंगा
किताबों के पन्‍नों में सोता रहूंगा
शायरों की नज्‍म में इरशाद करूंगा
किसी आशिक की मैं आशिकी बनूंगा
कभी किसी की कब्र में बिछूंगा
कभी शाने पर रखी जुल्‍फ में सजूंगा।

आज शाख पर मुरझा गया हूं
मैं जिंदगी की शब में खड़ा हूं
इस काबिल नहीं मुझे कोई बंया कर सके
मेरी गुमनाम तन्‍हाई को मुझसे जुदा कर सके।

मुरझाते हुए भी आखिरी खवाहिश है मेरी
कभी फूलों की तन्‍हाई को  न दे सदा कोई,
 बस मुस्‍कुराए दुनिया उसे देखकर
छिपी रहे दर्द की दांस्‍ता  कहीं ............


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