माना
मैं मचल गई थी
माना
मैं बहक गई थी,
तेरे
साथ जमीं को छोड़
मैं
फलक पर पहुंच गई थी।
एक अलहड़ से बच्चे की तरह बिना सोचे- समझे
मैनें
सपने बुने और तुझसे ख्वाहिश बयां की,
मगर
न जाने कब मेरे सपने सजा,
ख्वाहिशें खता बन गई,
आज
एक बार फिर तेरे लिए मैं बुत बन गई।
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