Saturday, October 20, 2012

तेरे लिए.....


माना मैं मचल गई थी
माना मैं बहक गई थी,
तेरे साथ जमीं को छोड़
मैं फलक पर पहुंच गई थी।
एक अलहड़ से बच्‍चे की तरह बिना सोचे- समझे
मैनें सपने बुने और तुझसे ख्‍वाहिश बयां की,
मगर न जाने कब मेरे सपने सजा, 
ख्‍वाहिशें खता बन गई,
आज एक बार फिर तेरे लिए मैं बुत बन गई। 

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