शोहरत और पैसों
से जुड़ी खूबसूरती की कहानी एक बार फिर अखबारों से लेकर टीवी चैनलों की सुर्खियां
बनी है। कल यह स्टोरी हिट होकर किसी फिल्म की कहानी भी बन जाएगी। इस बार कहानी
शुरुआत हुई है गीतिका के अंत से। एयरहोस्टेस का प्रोफेशन चुनने के साथ गीतिका ने
बहुत तरक्की हासिल की। बेहद कम समय में ऐश-ओ-आराम की जिंदगी का स्वाद चखा। लेकिन
अंतत: मौत को गले लगा लिया। मरने से पहले गीतिका ने एक सुसाइड नोट छोड़ा है। इस
नोट में गोपाल कांडा को गीतिका ने अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया है। गीतिका एक
महिला है, सुसाइड नोट पढ़ने के बाद सहानुभूति मिलना लाजमी ही है। लेकिन एक सवाल यह है कि
क्या गीतिका खुद जिम्मेदार नहीं है ? गीतिका का एक आम लड़की की तरह सेंसटिव नेचर
की थी। कांडा से धोखा मिलना उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। यह सब सच है, मगर यह सिर्फ एक
पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है कि आम इंसान की तरह गीतिका ने भी सपने देखे। उन्हें
पूरा करने के लिए एक शार्टकट चुना, जिसका नाम था कांडा। मगर हम इस बात को क्यों
भूल जाते हैं कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता। अगर शार्टकट से सफलता मिल भी जाए
तो वह ज्यादा दिन साथ नहीं रहती है। गीतिका के साथ भी शायद यही हुआ है। फिर आज
उसके हश्र के लिए सिर्फ कांडा गुनहगार ? भावनाएं इतनी कमजोर क्यों है कि कांडा जैसा
कोई भी इंसान उसका फायदा उठाए।
सिर्फ गीतिका के
साथ ही क्यों इसी लिस्ट में हाल ही में एक नाम है फिजा का। जिसने प्यार किया, शादी करने के
लिए धर्म बदला, दूसरी पत्नी होने का दर्जा हासिल किया, फिर तलाक और अंतत: गुमनामी और अब दर्दनाक मौत! जिस हाल में
फिजा की लाश मिली, वह साफ बयां करती है फिजा की बेबसी। फिजा ने भी अपनी मौत का डर जताया था।
लेकिन मरने से बचाने कोई नहीं आया। आज ऐसे किस्से एक नहीं हजार है और इनकी संख्या
बढ़ती ही जा रही है। ऐसा नहीं की सपने देखना गलत है, प्यार में वफादार होना कोई गुनाह है। लेकिन
जब समाज को परे रख कोई फैसला करो तो उसे जीने की हिम्मत भी करो। जब शोहरत पाना का
सपना देख लिया है तो उसका जरिया किसी और को बनाने से अच्छा है अपनी काबलियत को
बनाओ। गीतिका ने एक साल के अंदर अपनी सैलरी से कई गुना ज्यादा का इंक्रिमेंट
हासिल किया। बिना कंपनी के शेयर होने के बाद भी कंपनी के ट्रस्टी होने का पद मिल
गया। जब शोहरत इतनी जल्द मिली तो उसका साइड इफेक्ट भी तो होना था, उसे गलत कैसे
कहा जा सकता है। जब सफलता की नींव ही खुद अपनी न हो तो असफलता का डर क्यों! कांडा ने गीतिका
को टार्चर किया क्योंकि उसने वो मौके खुद दिए हैं। कंपनी के अपाइंटमेंट लेटर में
हर शाम रोज मिलकर जाने की शर्त को मानकर नौकरी करना गलत नहीं है ? हां जब तक पैसों
की चाहत रही सब ठीक लगा। जब हकीकत का अंदाजा हुआ तब सब संभालना नामुमकिन हो गया।
गीतिका ने जो
बातें सुसाइड नोट पर लिखी हैं वहीं पुलिस को पहले क्यों नहीं कहा गया। माना कांडा
से डर था जिस वजह से वो बोल नहीं सकी। जब मरने का ही रास्ता चुना था फिर डर कैसा
था? मार्डन सोसाइटी
की एक लड़की ने कांडा का कांड क्यों नहीं कर डाला। बहुत- सी गीतिका आज भी है
दुनिया में हैं, जिनमें कितनों की मौत की खबर तक नहीं मिलती। न जाने कितने ऐसे भी हैं जो जीते
जी मर चुके हैं। आज जिस समाज में हम हैं वहां हमें हौसलों से बहुत बुलंद होना है।
सपनों को देखने के साथ पूरा करने की हिम्मत भी बेशुमार चाहिए। असली जंग हमेशा
दूसरों से नहीं अपनों से शुरू होती है। गीतिका अपने आप से हार गई। अपने फैसलों का
शिकार हुई, जो वक्त के साथ गलत साबित हुए। आज एक ऐसी गीतिका चाहिए जो कांडा जैसे लोगों
को खुद के साथ खेलने न दे। मौत भी चुने तो अपने साथ गुनहगारों को मारकर, खुद मरकर नहीं!

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