क्या कभी तुमने
महसूस किया है…
जब मेरे सामने होकर भी मैं मुम्हें आवाज नहीं दे सकती,
जब तुम्हारे उठ के जाने पर मैं रोक नहीं सकती।
क्या कभी तुमने
महसूस किया है…
मेरे अंदर इंतजार कर
रहे उन तमाम ख्वाबों को
जो आज भी तुम्हारे
नाम पर बुने हैं।
क्या कभी तुमने
महसूस किया है…
मेरे सिले होंठ और
चीखती आंखों को
जो तुम पर बस अपना
हक चाहती है।
क्या कभी तुमने
महसूस किया है…
शाम को लौटकर मेरा खामोश
चौखट को देखना
और हर रात बस तुम्हारी
यादों के साथ सोना।
आज फिर तमाम सवाल बिखरे पड़े हैं मेरे सिरहाने,
जिनका जवाब मुझे बखूबी
मालूम है...
हर रोज किया है महसूस
तुमने मेरा हर दर्द,
फिर भी खुद से नहीं
एक बार कहा है!

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