Sunday, March 25, 2012

जिंदगी और पिज्‍जा


कभी सोचा है एक इंसान की जिंदगी और पिज्‍जा में एक जैसा क्‍या है। सवाल अजीब है मगर मुझे दोनों ही एक जैसे लगते है। क्‍योंकि पिज्‍जे के टुकड़ों की तरह हमारी जिंदगी भी टुकड़ों में बटी होती है। जिसमें एक हिस्‍सा मां-पापा के नाम, दूसरा पति के नाम, तीसरा समाज के नाम, चौथा भाई-बहन के नाम, पांचवा आफिस में कुर्बान। इतने टुकड़ों में बंटे होने के बाद भी जिंदगी से कोई खुश नही। कभी सोचा है इन सबके बीच इस पिज्‍जा में हमारे नाम का सॉस भी नहीं होता । लेकिन कहने को जिंदगी हमारी है जिसमें नाम जरुर हमारा है मगर हक नही है। ऐसे ही एक परेशान इंसान से मैं सुबह उठते ही मिली, मिलकर लगा चलो हम-सा कोई तो है यहां। जिसे गम बताकर हम भी रो लेंगे, रात भर किसी के कंधो पर अपने गम का बोझा रखकर सो लेंगे। तभी आंखे ढ़ग से खोली तो देखा यहां भी धोखा हो गया है। ये कोई हम जैसा नही आईने में हमारा ही चेहरा है। फिलहाल कोई चारा नही था, सबको अपना समझकर जिंदगी के एक खूबसूरत दिन का स्‍वागत करना था। जिसकी शुरुआत आफिस के नाम थी और शाम तक इस पिज्‍जे को खाने वालों की लं‍बी कतार थी। 

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