Monday, August 26, 2013

अब नहीं संभलना ...


कई दिनों से थकान है, किसी को कहूं तो कहेगा आराम कर लो। लेकिन क्‍या बताऊं अब खुद ही उठने का दिल नहीं। बस लगता है पड़े रहने दो जस का तस। कोई आवाज भी मत देना हो सके तो कोई खैरियत भी मत पूछना। क्‍योंकि इसी वजह ने आज जिंदगी तबाह कर दी है। सोचते – सोचते कमबख्‍त थक गए हैं कि कोई अपना हो, किसी को अपना कहे। कोई फिक्र करे, कोई साथ चले। किसी को तो मेरी खामोशियों की चीख भी सुनाई दे। लेकिन कब तक मैं य‍ह बोलती रहूं। अब बस चुप और कोई आवाज नहीं, न बोलना है न सुनना। जाओ छोड़ दिया खुद को, अब नहीं संभलना।  

Sunday, August 18, 2013

वक्‍त ने मुझे तेरा दीवाना बना डाला!


माना कि बहुत मशरूफ हो तुम, फिर भी तुम्‍हें बता दूं। आज मैंने वही सफेद सलवार कमीज पहनी है, जिसे आज के दिन पहली बार तुम्‍हारे लिए पहना था, महज तीन साल पहले । लेकिन आज इस सफेद सलवार कमीज के साथ मैंने तुम्‍हारे फेवरेट नीले रंग का दुपट्टा ओढ़ा है। पता है इसे ओढ़ते ही याद आ गया वो अल्‍फाज ब्‍लू क्‍वीन, हां कई दिनों पहले यही कहकर तुमने मुझे पुकारा था। सच कहूं तो यह सिर्फ महज अल्‍फाज नहीं यह मेरे लिए दुआओं सा पाक है और असरदार भी। चाहो तो कभी देख लेना आजमाकर मुर्दा भी हो गई तो जी उठूंगी एक बार तुझसे ब्‍लू क्‍वीन की पुकार सुन कर। आज हर याद ताजा हो गई और एक फिर तुमसे इश्‍क हो गया है। न जाने यह जादू तुम्‍हारा है या मेरी कशिश कि आज वक्‍त ने मुझे तेरा दीवाना बना डाला। 

Sunday, June 2, 2013

बारिश


तपती गर्मी से निजात दिलाने के लिए मानसून ने फिर एक बार दस्‍तक दे दी। यूं लगा जैसे मुझ पर बिजली गिरी हो। तुम्‍हारे साथ बारिश की कोई याद तो नहीं जुड़ी अब तक लेकिन मेरे अंदर तमाम ख्‍वाब आज भी जिंदा है। जिनमें बारिश में भीगते हम दोनों एक हो गए हैं। तम्‍हें मालूम है एक बार फिर मैं तपती धूप में अपने ख्‍वाब तुम्‍हारे ख्‍यालों की बारिश में भीग कर लिख रही हूं। 

Tuesday, May 28, 2013

कैनवास

जिंदगी एक ऐसा कैनवास है जिस पर वक्‍त हर रंग रंगता है। लेकिन कभी- कभी हिस्‍से में बस दो रंग आते हैं सफेद और काला। मजे की बात यह है दुनिया के किसी कोने में भी इन दो रंगों को रंग में नहीं गिना जाता। इसलिए कैनवास खाली भी रह जाता है। एक ऐसे ही खाली कैनवास है कि जिंदगी को करीब से देख रही हूं। जिसमें तमाम रंगों की ख्‍वाहिश की गई थी लेकिन हिस्‍से में खाली कैनवास ही आया। खैर ऊपर वाला शायद किसी इंतजार में ही होगा या अपने पसंदीदा रंगों को भरने का इंतजार कर रहा होगा।   

Wednesday, May 1, 2013

खबर मिली थी…



खबर मिली थी तुम छोड़कर चले गए हो मुझे

यही सुन मैं तुमसे मिलने दौड़ा चला आया।

मगर राख थी बची तुम्‍हारे बदन की वहां ,

तुम्‍हारी रुखसती का खत देरी से मिला था।

तुम होते तो शामत आ जाती डाकिए की उस रोज की तरह ,

जब मेरी पहली नौकरी का खत तुम्‍हे देर से मिला था।

कान पकड़े थे डाकिए ने और कहा था,

चचा! अब ऐसा कभी नहीं होगा।

मैं भी जानता था, तुम भी जानते थे और डाकिया भी,

तुम्‍हारे लिए वो कितना अहम वक्‍त था।

आज मैं भी उसी देरी का शिकार हुआ हूं,

लेकिन तुम्‍हीं कहो अब्‍बा में किसे जाकर कहूं।

एक पल तो आया तुम्‍हे जाकर बता दूं,

डाकिया  कमबख़्त फिर कामचोरी पर उतर आया।

मगर दूजे ही पल एहसास हुआ मेरे अब्‍बा तो चले गए

जिनसे सारे जमाने की शिकायत मैं किया करता।

मुझे मालूम है झूठे ही डाटते थे तुम मेरी जिद्द पर सबको,

और मैं सब पर उस डांट का रौब जमाता फिरता।

आज फिर एक बार कह दो! अब्‍बा

तुम्‍हारे जाने की खबर झूठी है,

सच कहता हूं मैं किसी को डाटने को भी नहीं कहूंगा।

अब्‍बा! बहुत नाराज हूं आज पहली बार सच में,

क्‍यूं चले गए अकेले मुझे छोड़ के यहां।

आजतक मेरे बिना घर की दहलीज भी न लांघी तुमने,

अम्‍मी के लाख रोकने पर भी ले जाते थे मुझे उंगली पकड़ के। 

मगर आज एक बार भी ख्‍याल नहीं आया मेरा,

कैसे रहेगा ये नालायक तुम्‍हारे बिना।

जी चाहता है तुम से कई दिन बात न करूं

तूम मनाओ भी तो मुंह मोड़ लूं।

मगर अब तुम्‍हारे साथ वो वक्‍त भी रुखसत हो गया,

बस खबर मिली है, जिसे सुन मैं बुत हो गया।

Sunday, February 24, 2013

कशमकश


कभी दिल और दिमाग एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं। जैसे किसी पुरानी दुश्‍मनी का हिसाब बराबर करने चले आए हैं। ऐसा नहीं मंजिल अलग हो दोनों की लेकिन रास्‍ते इतने अलग हैं जैसे 36 का आकंडा हो। किसकी सुनू समझा नहीं आता और थक कर दोनों की डांट लगा चुप करा देता हूं। तभी थोड़ी देर चुप रहने का ढ़ोंग करने वाले दिल और दिमाग की बड़बडाहट फिर शुरू हो जाती है। इस बार दोनों फिर पहले से कहीं ज्‍यादा ऊर्जावान हैं, बस मौका मिले तो उठा के पटक दें। मैं भी चाहता हूं किसी एक की शिकस्‍त हो जाए। मामला आर- पार का हो जाए। रोज रोज का यह झगड़ा कम से कम बंद हो जाए। लेकिन जो भी चित होगा फर्क मुझे पडेगा। खैर बिना इमोशल हुए मुझे दोनों की जंग देखनी है, ऐसा न हो कहीं दोनों ही चकनाचूर हो जाए, और मैं दोनों की हार का जश्‍न मनाते हुए सो जाऊं।    

माना मेरे किस्‍मत में नहीं कि तेरे साथ रहूं,
हर रोज तेरे घर लौटने को इंतजार करूं,
घर आकर तुझसे जमाने की शिकायत करूं,
दिन का बोझ रात तेरे कंधों पर रख दूं।
माना ऐसे तमाम पल मेरे किस्‍मत में नहीं,
मगर तू ही बता क्‍या मैं इनके लायक नहीं

अक्‍सर मेरे वालिद कहते थे
लड़की हो ख्‍वाब सोच समझ कर देखो,
बस इतना सुनते ही... 
मेरा गुस्‍सा सांतवें आसमान पर होता,
नाराज होकर न जाने क्‍या-क्‍या उन्‍हें कहती,
दो-चार, दस दिन बात भी नहीं करती।
मगर आज जब अपने ख्‍वाबों की लाश कंधों पर उठाई है
तब जाकर एहसास हुआ वालिद की बात कहां गलत थी! 
ऐसा भी नहीं था मैं नादान थी, 
बचपना था तो समझ न सकी।
बहुत जल्‍द बड़ी हो गई थी अच्‍छी तरह याद है,
अपने अश्‍क खुद ही बचपन से पोछने लगी थी।
आज तो बड़े होने का तमगा लग चुका है,
जिसकी  कीमत हर रोज चुका रही।  

चंद ख्‍वाब


बड़ी तबियत से देखे थे चंद ख्‍वाब हमने,
नजर न लगे इस डर से कभी बयां न किए,
मगर आज उनकी लाश पड़ी है सामने,
कल रात ही ख्‍वाब दम तोड़ चुके थे।

हक से ज्‍यादा नहीं मिलता सुना था लोगों से
मगर हमने औकात से ज्‍यादा ख्‍वाब देखे थे ।
चलो अच्‍छा हुआ जो भी हुआ,
ये सोच कर भी दर्द कम नहीं होता ।
ऐ खुदा तू ही तरस कर मुझ पर
दर्द सीने में दफन करने का हुनर दे। 

Wednesday, February 20, 2013

न जाने क्‍या रिश्‍ता था !



न जाने क्‍या रिश्‍ता था मां का मेरी नींद से,
 
लोरी की गूंज कान में पड़ते ही
नींद दबे पांव आंखो में आ जाती।
न जाने क्‍यों वो मेरे वालिद से भी डरती,
डांट सुनते ही मेरी आंखों में छिप जाती।
मगर आज बहुत बिगड़ गई है नींद मेरी,
न प्‍यार से सुनती, न डांट समझती,
बस सारी रात मेरे कमरे में आवारों- सी भटकती।
कभी जो दो पल को मुझ पर तरस भी खाती,
तो अगले ही पल काफूर हो जाती।
सारी रात देती हूं उसे धमकियां,
अब बस बहुत हुआ, संभल जा!  
वरना,  वा‍लिद के सामने खुल जाएंगे तेरी शिकायतों के चिट्ठे।
फिर भी नहीं सुनती मेरी एक बात भी,
करती है मर्जियां मुझे जगा सारी रात ही।
आज तो सारी हदें ही पार कर दी कमबख्‍त नींद ने,
चांद देखते हुए लेटा और उठ गया सूरज को देखते।
मजाल है जो नींद एक पल भी मेरे पास भटकी हो ,
कल तलक हमसफर थी, आज जैसे दुश्‍मन बन बैठी हो।
कई रातों से नहीं सोया, अम्‍मी को नहीं मालूम,
वरना आज भी लोरियों के आगे बेअसर हैं नींद के नखरे।
हां! अब जब लौटूंगा घर तो सो जाऊंगा उसी पलंग पर,
जहां कई बार रात में उठकर मां आती हैं मेरी तलाश में।

Wednesday, January 30, 2013

तेरे इंतजार में ..........


कैसे मान लूं गमों के साथ रहकर उनकी आदत पड़ जाती है,
मेरे तो गम खुले जख्‍म की तरह हर रोज गहरे हो रहे हैं।
जिसे भूले से भी मरहम तो नहीं मिला कोई आजतक,
मगर जख्‍मों को सुर्ख करने कई लोग रोज चले आते हैं।
तुम भी आओगे एक दिन यकीन है मुझे,
मगर मैं नहीं मेरी खाक मिलेगी...
तेरे नाम से सजे मेरे गरीब खाने में !