लड़की हो ख्वाब सोच समझ कर देखो,
बस इतना सुनते ही...
मेरा गुस्सा सांतवें
आसमान पर होता,
नाराज होकर न जाने क्या-क्या उन्हें
कहती,
दो-चार, दस दिन बात भी नहीं करती।
मगर आज जब अपने ख्वाबों की लाश कंधों
पर उठाई है
तब जाकर एहसास हुआ वालिद की बात कहां गलत थी!
ऐसा भी नहीं था मैं नादान थी,
बचपना था
तो समझ न सकी।
बहुत जल्द बड़ी हो गई थी अच्छी तरह
याद है,
अपने अश्क खुद ही बचपन से पोछने लगी थी।
आज तो बड़े होने का तमगा लग चुका है,
जिसकी कीमत हर रोज चुका रही।

Aaj iss zamane me sirf Insan ko jazbe ki zaroorat hai,jiske paas jazba hai wo har jang jeet sakta hai ?
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