कभी दिल और दिमाग एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं। जैसे किसी
पुरानी दुश्मनी का हिसाब बराबर करने चले आए हैं। ऐसा नहीं मंजिल अलग हो दोनों की
लेकिन रास्ते इतने अलग हैं जैसे 36 का आकंडा हो। किसकी सुनू समझा नहीं आता और थक
कर दोनों की डांट लगा चुप करा देता हूं। तभी थोड़ी देर चुप रहने का ढ़ोंग करने
वाले दिल और दिमाग की बड़बडाहट फिर शुरू हो जाती है। इस बार दोनों फिर पहले से कहीं ज्यादा ऊर्जावान हैं, बस मौका
मिले तो उठा के पटक दें। मैं भी चाहता हूं किसी एक की शिकस्त हो जाए। मामला आर- पार का हो जाए। रोज रोज का यह झगड़ा कम से कम बंद हो जाए। लेकिन
जो भी चित होगा फर्क मुझे पडेगा। खैर बिना इमोशल हुए मुझे दोनों की जंग देखनी है,
ऐसा न हो कहीं दोनों ही चकनाचूर हो जाए, और मैं दोनों की हार का जश्न मनाते हुए सो जाऊं।
Bahot Lajawab...
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