न जाने क्या रिश्ता था मां का मेरी नींद से,
लोरी की गूंज कान में पड़ते ही
नींद दबे पांव आंखो में आ जाती।
न जाने क्यों वो मेरे वालिद से भी डरती,
डांट सुनते ही मेरी आंखों में छिप जाती।
मगर आज बहुत बिगड़ गई है नींद मेरी,
न प्यार से सुनती, न डांट समझती,
बस सारी रात मेरे कमरे में आवारों- सी भटकती।
कभी जो दो पल को मुझ पर तरस भी खाती,
तो अगले ही पल काफूर हो जाती।
सारी रात देती हूं उसे धमकियां,
अब बस बहुत हुआ, संभल जा!
वरना, वालिद के सामने खुल जाएंगे तेरी
शिकायतों के चिट्ठे।
फिर भी नहीं सुनती मेरी एक बात भी,
करती है मर्जियां मुझे जगा सारी रात ही।
आज तो सारी हदें ही पार कर दी कमबख्त नींद ने,
चांद देखते हुए लेटा और उठ गया सूरज को देखते।
मजाल है जो नींद एक पल भी मेरे पास भटकी हो ,
कल तलक हमसफर थी, आज जैसे दुश्मन बन बैठी हो।
कई रातों से नहीं सोया, अम्मी को नहीं मालूम,
वरना आज भी लोरियों के आगे बेअसर हैं नींद के नखरे।
हां! अब जब लौटूंगा घर तो सो जाऊंगा उसी पलंग पर,
जहां कई बार रात में उठकर मां आती हैं मेरी तलाश में।

Richa ? aapne zaroor ye likhte waqt apni aankhe nam ki hongi.Maa ki mamta jiski koi barabari nahi ho sakti....
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