कभी दिल और दिमाग एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं। जैसे किसी
पुरानी दुश्मनी का हिसाब बराबर करने चले आए हैं। ऐसा नहीं मंजिल अलग हो दोनों की
लेकिन रास्ते इतने अलग हैं जैसे 36 का आकंडा हो। किसकी सुनू समझा नहीं आता और थक
कर दोनों की डांट लगा चुप करा देता हूं। तभी थोड़ी देर चुप रहने का ढ़ोंग करने
वाले दिल और दिमाग की बड़बडाहट फिर शुरू हो जाती है। इस बार दोनों फिर पहले से कहीं ज्यादा ऊर्जावान हैं, बस मौका
मिले तो उठा के पटक दें। मैं भी चाहता हूं किसी एक की शिकस्त हो जाए। मामला आर- पार का हो जाए। रोज रोज का यह झगड़ा कम से कम बंद हो जाए। लेकिन
जो भी चित होगा फर्क मुझे पडेगा। खैर बिना इमोशल हुए मुझे दोनों की जंग देखनी है,
ऐसा न हो कहीं दोनों ही चकनाचूर हो जाए, और मैं दोनों की हार का जश्न मनाते हुए सो जाऊं।
Sunday, February 24, 2013
लड़की हो ख्वाब सोच समझ कर देखो,
बस इतना सुनते ही...
मेरा गुस्सा सांतवें
आसमान पर होता,
नाराज होकर न जाने क्या-क्या उन्हें
कहती,
दो-चार, दस दिन बात भी नहीं करती।
मगर आज जब अपने ख्वाबों की लाश कंधों
पर उठाई है
तब जाकर एहसास हुआ वालिद की बात कहां गलत थी!
ऐसा भी नहीं था मैं नादान थी,
बचपना था
तो समझ न सकी।
बहुत जल्द बड़ी हो गई थी अच्छी तरह
याद है,
अपने अश्क खुद ही बचपन से पोछने लगी थी।
आज तो बड़े होने का तमगा लग चुका है,
जिसकी कीमत हर रोज चुका रही।
चंद ख्वाब
नजर न लगे इस डर से कभी बयां न किए,
मगर आज उनकी लाश पड़ी है सामने,
कल रात ही ख्वाब दम तोड़ चुके थे।
हक से ज्यादा नहीं मिलता सुना था लोगों
से
मगर हमने औकात से ज्यादा ख्वाब देखे
थे ।
चलो अच्छा हुआ जो भी हुआ,
ये सोच कर भी दर्द कम नहीं होता ।
ऐ खुदा तू ही तरस कर मुझ पर
दर्द सीने में दफन करने का हुनर दे।
Wednesday, February 20, 2013
न जाने क्या रिश्ता था !
न जाने क्या रिश्ता था मां का मेरी नींद से,
लोरी की गूंज कान में पड़ते ही
नींद दबे पांव आंखो में आ जाती।
न जाने क्यों वो मेरे वालिद से भी डरती,
डांट सुनते ही मेरी आंखों में छिप जाती।
मगर आज बहुत बिगड़ गई है नींद मेरी,
न प्यार से सुनती, न डांट समझती,
बस सारी रात मेरे कमरे में आवारों- सी भटकती।
कभी जो दो पल को मुझ पर तरस भी खाती,
तो अगले ही पल काफूर हो जाती।
सारी रात देती हूं उसे धमकियां,
अब बस बहुत हुआ, संभल जा!
वरना, वालिद के सामने खुल जाएंगे तेरी
शिकायतों के चिट्ठे।
फिर भी नहीं सुनती मेरी एक बात भी,
करती है मर्जियां मुझे जगा सारी रात ही।
आज तो सारी हदें ही पार कर दी कमबख्त नींद ने,
चांद देखते हुए लेटा और उठ गया सूरज को देखते।
मजाल है जो नींद एक पल भी मेरे पास भटकी हो ,
कल तलक हमसफर थी, आज जैसे दुश्मन बन बैठी हो।
कई रातों से नहीं सोया, अम्मी को नहीं मालूम,
वरना आज भी लोरियों के आगे बेअसर हैं नींद के नखरे।
हां! अब जब लौटूंगा घर तो सो जाऊंगा उसी पलंग पर,
जहां कई बार रात में उठकर मां आती हैं मेरी तलाश में।
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