Wednesday, September 19, 2012

छूने दो मुट्ठी भर आसमान



करियर और शादी, दोनों ही लड़की की जिंदगी में खास होते हैं। फिलॉसफी में कहें तो शादी जमीं तो करियर आसमान होता है। बस अपने आसमां तक पहुंचने की इजाजत हर लड़की को नहीं होती है। लेकिन अब वक्‍त करवट बदल रहा है, लड़कियां शादी से पीछे नहीं हट रहीं लेकिन करियर को पहले रख रहीं हैं। शायद इसलिए कि पति तो मिल ही जाएगा मगर करियर का वक्‍त शादी के बाद नहीं। इस सोच के पीछे की असली वजह कभी सोची है ?  अचानक पति परमेश्‍वर को दूसरा दर्जा कब मिल गया। लड़की की जिंदगी के लीड हीरो को सपोर्टिंग रोल कैसे मिल गया। जिस लड़की को बचपन से परिवार और संस्‍कार सिखाए जाते हैं वह अचानक अपने लिए नए नियम बनाना क्‍यों चाहती है?
वजह कई हैं मगर जो अहम है वो है मेंटली आजाद होने की आजादी। कह सकते हैं वजह दो हैं इमोशनल और प्रेक्टिल। इमोशनल पहलू है कि एक छोटे से शहर से जो लड़की आगे बढने के लिए इतने जोश में है कि किसी की सुनना नहीं चाहती, बस अपना मुकाम पाना चा‍हती है। शादी को उसने किनारे कर दिया है क्‍योंकि उसने अपने आस-पास ऐसी औरतों को देखा है जो खुश है मगर कहने को। किचन में क्‍या आएगा वो डिसाइड कर सकती हैं मगर बच्‍चे का करियर नहीं। क्‍योंकि मामला गंभीर है और इसका फैसला पति मतलब पिता लेगा।
उसने अपनी मां के अंदर दिल के किसी कोने में भी एक मुरझाया- सा सपना आज भी पड़ा देखा है। जिसने शादी के साथ दम तोड़ दिया था। कब सपने बच्‍चों और पति में बदल गए खुद उसे ही पता नहीं चला है। आज वो अपने सपनों को बच्‍चों में जी रही है। हर लड़की ने इस वक्‍त को अपने घर में या फिर किसी करीबी के साथ्‍ देखा है। यह बहुत खास वजह भी है जो उसने आज शादी से तौबा करके पहले सपने पूरे करने का वादा खुद से किया है। करियर में उसे आज सिर्फ औहदा ही नहीं चाहिए बल्कि एक फइनेंशली फिट लाइफ चाहिए। जिससे वह कल अपने बच्‍चों के लिए फैसले ले सके सिर्फ उसकी राय औपचारिकता के लिए नहीं मांगी जाए। साथ ही जब बच्‍चे मां के बारे में सोचे तो मां पर दया और सहानूभूति नहीं गर्व हो।
दूसरी प्रैक्टिकल वजह है लड़कियों का लड़कों से आगे खुद को साबित करना। जिसके लिए मां-पापा और समाज जिम्‍मेदार है। जिनका एक सूत्री कार्यक्रम है लड़की को लड़की होने का एहसास कराना। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, जाओं तो शाम होने से पहले घर आओ। कॉलेज भाई छोड़ आएगा। फिर चाहे भाई  कालेज की लड़कियों को छेड़ता पाया जाए। सबसे बड़ी मुसीबत लड़का किसी अनजान से बात करे तो कम्‍यूनिकेशन बना रहा है और लड़की बात करते मिले तो पड़ोसी घर पहुंचकर कहेंगे शादी कर दो लड़‍की बड़ी हो गई है। इतनी मुसीबत कि दिमाग का दही हो जाए और लगे ऐ खुदा तूने लड़की क्‍यों बनाया ।
मगर इन सब से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है, जिसे आज अपनाया गया है। खुद की पहचान बनाओ क्‍योंकि रास्‍ता बताने कोई नहीं आता रास्‍ते खुद बनाने होते हैं। इसी को गांठ बांध आज की लड़की चल पड़ी है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। हां अब बात आती है सही वक्‍त पर शादी की, तो क्‍या बुरा है शादी उस वक्‍त करना जब उसे खुद पता हो कि उसकी शादी है। अपनी मां, ताई , बुआ, चाची की तरह वो नहीं चाहती कि बच्‍चों से कहे जब शादी हुई तो हमें पता ही नहीं था। उसे सिर्फ रिश्‍ते को निभाना नहीं किसी के साथ जीना है। बड़ी अजीब कशमकश होती है जिंदगी की शादी। आज एक लड़की उसे समझकर अपनाना चा‍हती है । अगर समाज का एक वर्ग गलत मानता है तो उसे यह सोचना होगा जब परिपक्‍व बनना है तो ग‍लतियां भी होंगी और सही रास्‍ता भी मिलेगा। एक बार उस लड़की की नजर से भी देखा जाए जो समाज का ही हिस्‍सा है। जो लोग आज भी नहीं समझे उन्‍हें समझना होगा। शादी करने से पहले उसे करियर का पायदान पार करना है, करवाचौथ रखने से पहले करियर बनाना है।           

Monday, September 17, 2012

गीतिका का शॉर्टकट


शोहरत और पैसों से जुड़ी खूबसूरती की कहानी एक बार फिर अखबारों से लेकर टीवी चैनलों की सुर्खियां बनी है। कल यह स्‍टोरी हिट होकर किसी फिल्‍म की कहानी भी बन जाएगी। इस बार कहानी शुरुआत हुई है गीतिका के अंत से। एयरहोस्‍टेस का प्रोफेशन चुनने के साथ गीतिका ने बहुत तरक्‍की हासिल की। बेहद कम समय में ऐश-ओ-आराम की जिंदगी का स्‍वाद चखा। लेकिन अंतत: मौत को गले लगा लिया। मरने से पहले गीतिका ने एक सुसाइड नोट छोड़ा है। इस नोट में गोपाल कांडा को गीतिका ने अपनी मौत का जिम्‍मेदार ठहराया है। गीतिका एक महिला है, सुसाइड नोट पढ़ने के बाद सहानुभूति मिलना लाजमी ही है। लेकिन एक सवाल यह है कि क्‍या गीतिका खुद जिम्‍मेदार नहीं है ? गीतिका का एक आम लड़की की तरह सेंसटिव नेचर की थी। कांडा से धोखा मिलना उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। यह सब सच है, मगर यह सिर्फ एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है कि आम इंसान की तरह गीतिका ने भी सपने देखे। उन्‍हें पूरा करने के लिए एक शार्टकट चुना, जिसका नाम था कांडा। मगर हम इस बात को क्‍यों भूल जाते हैं कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता। अगर शार्टकट से सफलता मिल भी जाए तो वह ज्‍यादा दिन साथ नहीं रहती है। गीतिका के साथ भी शायद यही हुआ है। फिर आज उसके हश्र के लिए सिर्फ कांडा गुनहगार ? भावनाएं इतनी कमजोर क्‍यों है कि कांडा जैसा कोई भी इंसान उसका फायदा उठाए।
सिर्फ गीतिका के साथ ही क्‍यों इसी लिस्‍ट में हाल ही में एक नाम है फिजा का। जिसने प्‍यार किया, शादी करने के लिए धर्म बदला, दूसरी पत्‍नी होने का दर्जा हासिल किया, फिर तलाक और अंतत: गुमनामी और अब दर्दनाक मौत! जिस हाल में फिजा की लाश मिली, वह साफ बयां करती है फिजा की बेबसी। फिजा ने भी अपनी मौत का डर जताया था। लेकिन मरने से बचाने कोई नहीं आया। आज ऐसे किस्‍से एक नहीं हजार है और इनकी संख्‍या बढ़ती ही जा रही है। ऐसा नहीं की सपने देखना गलत है, प्‍यार में वफादार होना कोई गुनाह है। लेकिन जब समाज को परे रख कोई फैसला करो तो उसे जीने की हिम्‍मत भी करो। जब शोहरत पाना का सपना देख लिया है तो उसका जरिया किसी और को बनाने से अच्‍छा है अपनी काबलियत को बनाओ। गीतिका ने एक साल के अंदर अपनी सैलरी से कई गुना ज्‍यादा का इंक्रिमेंट हासिल किया। बिना कंपनी के शेयर होने के बाद भी कंपनी के ट्रस्‍टी होने का पद मिल गया। जब शोहरत इतनी जल्‍द मिली तो उसका साइड इफेक्ट भी तो होना था, उसे गलत कैसे कहा जा सकता है। जब सफलता की नींव ही खुद अपनी न हो तो असफलता का डर क्‍यों! कांडा ने गीतिका को टार्चर किया क्‍योंकि उसने वो मौके खुद दिए हैं। कंपनी के अपाइंटमेंट लेटर में हर शाम रोज मिलकर जाने की शर्त को मानकर नौकरी करना गलत नहीं है ? हां जब तक पैसों की चाहत रही सब ठीक लगा। जब हकीकत का अंदाजा हुआ तब सब संभालना नामुमकिन हो गया।
गीतिका ने जो बातें सुसाइड नोट पर लिखी हैं वहीं पुलिस को पहले क्‍यों नहीं कहा गया। माना कांडा से डर था जिस वजह से वो बोल नहीं स‍की। जब मरने का ही रास्‍ता चुना था फिर डर कैसा था मार्डन सोसाइटी की एक लड़की ने कांडा का कांड क्‍यों नहीं कर डाला। बहुत- सी गीतिका आज भी है दुनिया में हैं, जिनमें कितनों की मौत की खबर तक नहीं मिलती। न जाने कितने ऐसे भी हैं जो जीते जी मर चुके हैं। आज जिस समाज में हम हैं वहां हमें हौसलों से बहुत बुलंद होना है। सपनों को देखने के साथ पूरा करने की हिम्‍मत भी बेशुमार चाहिए। असली जंग हमेशा दूसरों से नहीं अपनों से शुरू होती है। गीतिका अपने आप से हार गई। अपने फैसलों का शिकार हुई, जो वक्‍त के साथ गलत साबित हुए। आज एक ऐसी गीतिका चाहिए जो कांडा जैसे लोगों को खुद के साथ खेलने न दे। मौत भी चुने तो अपने साथ गुनहगारों को मारकर, खुद मरकर नहीं!



Saturday, September 15, 2012

जिंदगी की आखिरी सांस ले रहा हूं
अपनी खता जानने का इंतजार कर रहा हूं,
आसमा से गुजारिश सुबह शाम करता हूं
अपने चंद आखिरी चाहता हूं।

जिंदगी की राह में अकेला चला मैं
फूल बनकर भी आज गुमशुदा हूं मैं,
ख्‍वाहिश है कभी जरिया बनूं मैं
अपनी जिंदगी किसी के नाम करूं मैं।
 
आसमा की पनाह में , जमीं के दस्‍तरखान में
आफताब की चमक में, चांद की फलक में
चंद खूबसूरत ख्‍वाहिश है मेरी
याद कर जिन्‍हें जीता हूं आज भी।

मैं मंदिर मस्जिद में सजदा करूंगा
किताबों के पन्‍नों में सोता रहूंगा
शायरों की नज्‍म में इरशाद करूंगा
किसी आशिक की मैं आशिकी बनूंगा
कभी किसी की कब्र में बिछूंगा
कभी शाने पर रखी जुल्‍फ में सजूंगा।

आज शाख पर मुरझा गया हूं
मैं जिंदगी की शब में खड़ा हूं
इस काबिल नहीं मुझे कोई बंया कर सके
मेरी गुमनाम तन्‍हाई को मुझसे जुदा कर सके।

मुरझाते हुए भी आखिरी खवाहिश है मेरी
कभी फूलों की तन्‍हाई को  न दे सदा कोई,
 बस मुस्‍कुराए दुनिया उसे देखकर
छिपी रहे दर्द की दांस्‍ता  कहीं ............