जिंदगी एक ऐसा कैनवास है जिस पर
वक्त हर रंग रंगता है। लेकिन कभी- कभी हिस्से में बस दो रंग आते हैं सफेद और
काला। मजे की बात यह है दुनिया के किसी कोने में भी इन दो रंगों को रंग में नहीं
गिना जाता। इसलिए कैनवास खाली भी रह जाता है। एक ऐसे ही खाली कैनवास है कि जिंदगी
को करीब से देख रही हूं। जिसमें तमाम रंगों की ख्वाहिश की गई थी लेकिन हिस्से
में खाली कैनवास ही आया। खैर ऊपर वाला शायद किसी इंतजार में ही होगा या अपने
पसंदीदा रंगों को भरने का इंतजार कर रहा होगा।
Tuesday, May 28, 2013
Wednesday, May 1, 2013
खबर मिली थी…
खबर मिली थी तुम छोड़कर चले गए
हो मुझे
यही सुन मैं तुमसे मिलने दौड़ा
चला आया।
मगर राख थी बची तुम्हारे बदन की
वहां ,
तुम्हारी रुखसती का खत देरी से
मिला था।
तुम होते तो शामत आ जाती डाकिए
की उस रोज की तरह ,
जब मेरी पहली नौकरी का खत तुम्हे
देर से मिला था।
कान पकड़े थे डाकिए ने और कहा
था,
चचा! अब ऐसा कभी नहीं होगा।
मैं भी जानता था, तुम भी जानते
थे और डाकिया भी,
तुम्हारे लिए वो कितना अहम वक्त
था।
आज मैं भी उसी देरी का शिकार हुआ
हूं,
लेकिन तुम्हीं कहो अब्बा में
किसे जाकर कहूं।
एक पल तो आया तुम्हे जाकर बता
दूं,
डाकिया कमबख़्त फिर कामचोरी पर उतर आया।
मगर दूजे ही पल एहसास हुआ मेरे अब्बा
तो चले गए
जिनसे सारे जमाने की शिकायत मैं किया
करता।
मुझे मालूम है झूठे ही डाटते थे तुम
मेरी जिद्द पर सबको,
और मैं सब पर उस डांट का रौब जमाता
फिरता।
आज फिर एक बार कह दो! अब्बा
तुम्हारे जाने की खबर झूठी है,
सच कहता हूं मैं किसी को डाटने को भी
नहीं कहूंगा।
अब्बा! बहुत नाराज हूं आज पहली बार सच में,
क्यूं चले गए अकेले मुझे छोड़ के यहां।
अम्मी के लाख रोकने पर भी ले जाते थे
मुझे उंगली पकड़ के।
मगर आज एक बार भी ख्याल नहीं आया मेरा,
कैसे रहेगा ये नालायक तुम्हारे बिना।
जी चाहता है तुम से कई दिन बात न करूं
तूम मनाओ भी तो मुंह मोड़ लूं।
मगर अब तुम्हारे साथ वो वक्त भी रुखसत
हो गया,
बस खबर मिली है, जिसे सुन मैं बुत हो
गया।
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