मेरे तो गम खुले जख्म की
तरह हर रोज गहरे हो रहे हैं।
जिसे भूले से भी मरहम तो नहीं
मिला कोई आजतक,
मगर जख्मों को सुर्ख करने
कई लोग रोज चले आते हैं।
तुम भी आओगे एक दिन यकीन है
मुझे,
मगर मैं नहीं मेरी खाक
मिलेगी...
तेरे नाम से सजे मेरे गरीब
खाने में !

Hamari society ne zakhmo ko kuredne ka zimma jo le rakha,isse hame bahar nikalna hoga...
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